भारत का जन्म कैसे हुआ ?
भारत के बनने की कहानी आज से 30 करोड़ साल पहले शुरू हुई है, आज धरती पर जितने भी कॉन्टिन मौजूद है एशिया, अफ्रीका, नॉर्थ अमेरिका, साउथ अमेरिका, अंटार्कटिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया यह सभी कॉन्टिनेंट आज से करीब 20 करोड़ साल पहले आपस में जुड़े हुए थे उसे समय धरती पर सिर्फ एक ही सुपरकॉन्टिनेंट मौजूद था!
पंजिया
पंजिया और आज दिखाई देने वाले सातों महाद्वीप कॉन्टिनेंट में कुछ इस प्रकार से जुड़े हुए थे, जिसमें आप अपने भारत को भी देख सकते हो, इस समय सुपरकॉन्टिनेंट पर अलग-अलग प्रजातियों के जीवन का राज चल रहा था, यह वो दौर था जब डायनासोर धरती पर इवॉल्व होने लगे थी और पंजिया सुपरकॉन्टिनेंट पर इधर-उधर फैले हुए थे, सुपरकॉन्टिनेंट इतना बड़ा था कि इस पर दूर-दूर तक फैली जमीन इस कॉन्टिनेंट के क्लाइमेट पर बहुत ज्यादा असर डालती थी, पंजिया सुपरकॉन्टिनेंट की दुनिया आज से बिल्कुलअलग थी, पंजिया कॉन्टिनेंट जो हिस्से समुद्र से सटे हुए थे उन पर कुछ किलोमीटर अंदर तक हरियाली छाई हुई थी और बड़े-बड़े जंगल मौजूद थे, क्योंकि पेंचिया कांटिनेंट के किनारो वाली जगह पर अधिक बारिश होती थी!
पंजिया कॉन्टिनेंट की मध्य वाली जमीन
पंजिया कॉन्टिनेंट इतना बड़ा था कि इसके मध्य में हमेशा सुख बना रहता, जहां कभी भी बारिश नहीं होती जिस वजह से पंजिया कॉन्टिनेंट की मध्य वाली जमीन एकदम बंजर और वीरान थी, जहां धूल के तूफान उठाते!
20 करोड़ साल पहले
आज से करीब 20 करोड़ साल पहले पंजिया कॉन्टिनेंट दो भागों में टूटने लगा, जिससे दो नए सबकॉन्टिनेंट्स का निर्माण हुआ, पहले सबकॉन्टिनेंट बना लोरसिया, जिसमें से आगे चलकर एशिया, यूरोप और नॉर्थ अमेरिका बनने वाले थे और दूसरा सब कॉन्टिनेंट बना गोंडवाना जिससे आगे चलकर साउथ अमेरिका, अफ्रीका, इंडिया, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका बनने वाले थे, जब वह कॉन्टिनेंट लोरसिया और गोंडवाना में टूट रहा था तो दोनों कॉन्टिनेंट के मध्य में एक समुद्र का निर्माण होने लगा था, जिसे वैज्ञानिकों ने टेथीस ओसीएम का नाम दिया!
वैज्ञानिको को कैसे पता चला
आखिर वैज्ञानिको को कैसे पता चला कि अतीत में पृथ्वी के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे!
तो इसका जवाब यह है कि 20वि सदी की शुरुआत में एक जर्मन वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगेनर ने नोटिस किया की साउथ अमेरिका का पूर्वी तट अफ्रीका के पश्चिमी तट के साथ एकदम सटीक बैठता है, जैसे मानव यह दोनोंएक पहिये के दो टुकड़े हो, अफ्रीका साइड में मेडागास्कर इस पजल में हिस्सा लेता है, फिर इंडिया इस पजल को पूरा करता है, अगर आप दुनिया के मैप को देखा तो आपको दिखाई देगा कि कई देशों के समुद्री तट एक दूसरे के पजल पीस की तरह दिखाई देते हैं, जैसे प्राचीन और अफ्रीका अल्फ्रेड वेगनर्दे सिर्फ पृथ्वी की जियोग्राफी पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि उन्होंने यह नोटिस किया कि दो अलग-अलग कॉन्टिनेंट के किनारो पर समुद्र के इस बार मौजूद फॉसिल समुद्र के दूसरी साइड मौजूद फॉसिल से बिल्कुल मेल खाते हैं!
अब दो अलग-अलग कॉन्टिनेंट के पाउडर जिनके बीच विशाल समुद्र मौजूद है उनके पाउडर पर से तरह की फॉसिल्स का मिलना चाहिए दर्शाता है कि अतीत में कभी यह दोनों कॉन्टिनेंट आपस में जुड़े हुए थे बाद में वैज्ञानिकों ने अलग-अलग कॉन्टिनेंट पर फॉसिल्स को खोज फिर उनका मैच किया कि कौन सा फॉसिल किस कॉन्टिनेंट के साथ समानता दिखता है!
उसके आधार पर वैज्ञानिक अतीत की कड़ियों को जोड़ने गई और एक मैप बनाते गए जिसमें कॉन्टिनेंट को आपस में जोड़ने गए जिनमें फॉसिल्स आपस में समान थे जब पूरा मैप बनकर तैयार हुआ तो मैप कुछ इस प्रकार बना कि अतीत में पृथ्वी के सभी कॉन्टिनेंट आपस में जुड़े हुए थे, हालांकि शुरुआत में तो पंजीय सुपरकॉन्टिनेंट की थ्योरी पर किसी को भी विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन जब हमारी टेक्नोलॉजी एडवांस होने लगी तब हमें पता चला कि सच में पृथ्वी पर सिर्फ एक ही महाद्वीप मौजूद था, जिससे टूटकर साथ अलग-अलग कॉन्टिनेंट का निर्माण हुआ!
वह कौन सी शक्ति है जिसने अलग-अलग महाद्वीपों का निर्माण किया
वह कौन सी शक्ति है जिसने अलग-अलग महाद्वीपों का निर्माण किया तो उसे महाशक्ति को जानने के लिए हमें पृथ्वी के उसे दौर में जाना होगा जब पृथ्वी का निर्माण हो रहा था, यह तो हम सभी जानते हैं कि हमारे सूर्य और सौरमंडल के सभी ग्रहों का निर्माण एक सोलर नेबुला से हुआ है, और हमारी पृथ्वी भी उसे सोलर नेबुला में मौजूद गैस और धूल के पात्रों से बनी थी शुरुआती दौर में हमारे सौरमंडल में करीब 100 से भी ज्यादा छोटे-छोटे प्लैनेट्स का निर्माण हुआ था, जिनका ऑर्बिट अनस्टेबल था!
पृथ्वी का निर्माण
ग्रेविटी से प्रभावित होकर यह छोटे-छोटे प्लैनेट्स एक दूसरे से टकराने लगे और इस दौर में एक मंगल ग्रह जितना बड़ा दिया थिया नामक प्लेनेट हमारी धरती से भी टकराया था, वह टकरा इतना भीशाल था कि उसे इतनी हिट पैदा हुई कि हमारी पूरी पृथ्वी निकले हुए वालों की एक बॉल बन गई!
पृथ्वी में मौजूद भारी एलिमेंट्स इकट्ठे होने लगी और हल्के एलिमेंट्स सतह पर आने लगे जिसे ठंडा होकर का निर्माण हुआ और पृथ्वी की क्रेस्ट के नीचे पृथ्वी में मौजूद सारी हिट ट्रैप होकर रह गई और वह हिट आज भी पृथ्वी की कर में कैद है, पृथ्वी की कोर का तापमान सूर्य की सतह के बराबर है जो कि लगभग 6000 डिग्री सेल्सियस है, पृथ्वी की कर के गर्म होने का दूसरा कारण यह है कि पृथ्वी की कर में मौजूद हैवी एलिमेंट्स टिके होते रहते हैं, जिससे पृथ्वी को कोर में हिट पैदा हुई!
पृथ्वी की जियोग्राफी को कैसे बदला
कॉन्टिनेंट अलग-अलग महाद्वीपों में टूट गया पृथ्वी की कर की वजह से ही हिमालय का निर्माण हुआ, पृथ्वी की कोर ने पृथ्वी की जियोग्राफी को कैसे बदला, पृथ्वी की कर में मौजूद हिट बाहर निकलना चाहती है, जो इसके ऊपर मौजूद मेंटल में कन्वैक्शन करंट पैदा कर देती है, कन्वेंशन करंट एक तरह से फ्लड का सर्कुलर मोशन जैसे गर्म हवा ऊपर उठती है और ऊपर जाकर वह ठंडी होजाती है और वह ठंडी हवा फिर से नीचे आने लगती है और नीचे आकर वह ठंडी हवा फिर से गर्म हो जाती है और गर्म होकर वह हवा फिर से ऊपर उठने लगती है, यह साइकिल निरंतर चलती रहती है इसी को कन्वैक्शन करंट कहा जाता है!
उदाहरण –
अगर आप किसी बर्तन में पानी को उबालो तो बर्तन में मौजूद गर्म पानी ऊपर उठने लगता है और ठंडा पानी नीचे जाने लगता है, ये भी कन्वैक्शन करंट का एक उदाहरण है!
इसी तरह पृथ्वी में मेंटल में कन्वैक्शन करंट पैदा होते हैं, कन्वैक्शन करंट की वजह से लावा पृथ्वी की प्लेट्स के क्रैक से बाहर निकालने की कोशिश करता है, जब लावा ऊपर उठकर प्लेट्स के क्रैक के बीच चिपक जाता है, जिस वजह से दोनों प्लेट्स के बीच मौजूद क्रैक भरता जाता है, लेकिन पृथ्वी की कोर में इतनी ज्यादा हिट है कि कन्वेंशन कंट्रोल लावा पृथ्वी से बाहर निकालने के लिए हर संभव प्रयास करता है, लेकिन जो लावा पहले निकला था वो ठंडा होकर क्रैक के मुहाने को छोटा कर दिया था, उस जगह पर प्रेशर बढ़ने लगता है तो वह प्रेशर इतना ज्यादा होता है कि दोनों प्लेट्स को एक दूसरे से दूर धकेल देता है, पृथ्वी के अंदर यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है जिस वजह से दो प्लेट टूट कर एक दूसरे से दूर जाती रहती है!
महाद्वीपों का निर्माण
पृथ्वी के अंदर हो रही इस गतिविधि की वजह से आज अलग-अलग महाद्वीपों का निर्माण हो पाया पृथ्वी के अंदर यह प्रक्रिया आज की जारी है, इस प्रक्रिया की वजह से जारी है पृथ्वी पर मौजूद इस क्रैक को कई जगह पर देखा भी जा सकता है, पृथ्वी की क्रेस्ट और मेंटल का ऊपरी भाग बड़े-बड़े हिस्सों में विभाजित है, जिसे टैकटोनिक प्लेट्स बोला जाता है!
टैकटोनिक प्लेट्स के जो किनारे होते हैं उन्हें प्लेट बाउंड्रीज बोला जाता है टैकटोनिक प्लेट्स के किनारो पर ही सबसे ज्यादा जियोलॉजिकल घटनाएं घटी है, जैसे की प्लेट ब्रिज के पास ही सबसे ज्यादा भूकंप आते हैं, प्लेट बाउंड्रीज के पास ही ऊंची ऊंची पर्वत मलाई बनती है ज्वालामुखी फटते हैं और ओशनिक ट्रेंचेज बनते हैं, टैकटोनिक प्लेट्स में होने वाली इस मूवमेंट को कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट बोला जाता है, पृथ्वी पर दर्जनों प्लेट्स मौजूद है, जिनमें कुछ एक दूसरे से दूर जा रही है, तो कुछ टकरा रही है कोई कोई प्लेट इतनी बड़ी होती है कि उसके नीचे मौजूद हिट को बसता नहीं मिलता तो वह हिट उसे प्लेट की क्रेस्ट पर इतना प्रेशर लगती है कि क्रेस्ट को तोड़कर बाहर निकल आती है!
जिसे हम ज्वालामुखी भी बोलते हैं, अब कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट की इस प्रक्रिया में कुछ प्लेट्स एक दूसरे से दूर जाती है, तो कुछ एक दूसरे में मर्ज होती है, जब आपस में मर्ज होती है दूसरी प्लेट उसके ऊपर प्लेट नीचे जाकर रॉक्स पर गल कर लावा में बदल जाते हैं और पृथ्वी के अंदर यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, जिससे उन दोनों प्लेट्स के ऊपर मौजूद कॉन्टिनेंट एक दूसरे के पास आते जाते हैं और उन दोनों कॉन्टिनेंट के बीच मौजूद समुद्र की दूरियां कम होती जाती है और एक समय ऐसा आता है कि दोनों कॉन्टिनेंट आपस में टकरा जाते हैं और एक्सीडेंट बना देते हैं सुपरकॉन्टिनेंट पहले दो हिस्सों में टूटा लॉरेंस या और गोंडवाना कुछ करोड़ सालों के बाद यह दोनों सुपरकॉन्टिनेंट लारेशिया और गोंडवाना भी अलग-अलग कॉन्टिनेंट में विभाजित होने लगे!
14 करोड़ साल पहले
साउथ अमेरिका अफ्रीका से दूर चला गया नॉर्थ अमेरिका यूरोप से दूर चला गया ऑस्ट्रेलिया अंटार्कटिका से अलग हो गया और आज से करीब 14 करोड़ साल पहले भारत अफ्रीका के साउथ ईस्ट से अलग हो गया, इस घटना से कही पर बड़ी बड़ी वैली बनाने वाली थी, तो कहीं पर्वतमाला है जगह से प्लेट्स एक दूसरे से दूर जा रही थी वहां पर बड़ी-बड़ी घटिया बनी और जिस जगह पर दो प्लेट्स जाकर मर्ज हो रही थी, वहां पर पर्वत मालाए बनी, ऐसा इसलिए हुआ कि जब दो प्लेन ऊपर उठने लगी, जिससे बड़ी-बड़ी पर्वत श्रृंखलाएं खड़ी हो गई थी, जिस तरह पृथ्वी पर पर्वत मालाए बन रही थी उसी तरह जिस जगह से दो प्लेट टूट कर अलग हुई थी पर बड़ी-बड़ी घटिया बन गई, जैसे कि ग्रैंड कैनयन करीब 450 किलोमीटर तक फैली हुई है, जिसकी चौड़ाई 20 किलोमीटर है और इसकी गहराई लगभग 2 किलोमीटर है!
भारत का निर्माण
आज से करीब 14 करोड़ साल पहले भारत गोंडवाना लैंड का हिस्सा था जिससे अलग होकर भारत धीरे-धीरे एशिया की ओर बढ़ने लगा करोड़ सालों तक भारत की भूमि ने एशिया की ओर अपना सफर जारी रखा आमतौर पर टैकटोनिक प्लेट्स एक साल में 5 सेंटीमीटर तक सकती है लेकिन भारत की एशिया की ओर बढ़ने की गति नॉर्मल से चार गुना ज्यादा थी, भारत गरीब 20 सेंटीमीटर 10 साल की दर से एशिया की ओर बढ़ रहा था!
इतनी तेजी से इसलिए लोरासिया के एशिया की ओर बढ़ रहा था क्योंकि गोंडवाना लैंड के नीचे बहुत बड़े-बड़े ब्लूम थे, इस तरह के ब्लूम बनते हैं यह ब्लूम पृथ्वी की कर में मौजूद हिट को ऊपरी लेयर मेंटल तक पहुंचाई ग्रस्त के पास पहुंचते हैं तो क्रेस्ट के ठोस होने की वजह से यह वहां पर फैलने लगते हैं जिसकी वजह से टैकटोनिक प्लेट्स में क्रैक आने लगते हैं, और गोंडवाना लैंड की इंडियन प्लेट के नीचे भी इसी तरह का एक रूम थाजिसकी वजह से इंडियन प्लेट की मोटाई कम रह गई जिस वजह से इंडियन प्लेट हल्की हो गई, यही कारण था कि इंडियन प्लेट दूसरी प्लेट के मुकाबले चार गुना तेजी से तैरने लगी !
5 करोड़ साल पहले
आज से करीब 5 करोड़ साल पहले भारत एशिया से टकरा जाता है इस टकराव की वजह से हिमालय का निर्माण होने लगता है, इंडियन प्लेट लगातार एशियाई प्लेट के नीचे धरती जा रही है, जिस वजह से हर साल हिमालय की कुछ सेंटीमीटर से ऊंचाई बढ़ जाती है, इंडियन प्लेट की इसी मोमेंट की वजह से नेपाल और उसके आसपास के एरिया में जोरदार भूकंप आते हैं, पृथ्वी के अंदर टैकटोनिक प्लेट्स की मूवमेंट अभी भी जारी है अभी भी पृथ्वी के सभी महाद्वीप लगातार मूव कर रहे हैं, वैज्ञानिक ऐसा अनुमान लगाते हैं कि अभी से करोड़ों साल बाद पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक बार फिर से मर्ज हो जाएंगे और एक बार फिर से पृथ्वी पर एक ही सुपरकॉन्टिनेंट बन जाएगा वैज्ञानिकों ने भविष्य में बनने वाले उसे सुपरकॉन्टिनेंट का नाम पंजिया प्रॉक्सिमा रखा है !
सच में प्रकृति बहुत ही शक्तिशाली है एक बार कल्पना कीजिए कि इतनी विशाल प्लेट्स को एक जगह से दूसरी जगह तक धकेलना में और पर्वतों का निर्माण करने में पृथ्वी की क्रेस्ट के नीचे किस हद तक मेंटल में कन्वैक्शन करंट के भवंडर बना रहे होंगे और कभी-कभी पृथ्वी की मेंटल में हुई हलचल को पृथ्वी की क्रेस्ट के ऊपर हम इंसानों को भी सहन करना पड़ता है, जब दो प्लेट्स के जंक्शनएक दूसरे से टूटते हैं, तो पृथ्वी की सतह इतनी जोर से बोलता है कि इसकी सतह पर विनाशकारी भूकंप आने लगते हैं समुद्री में बहुत बड़ी-बड़ी सुनामी आने लगती है, जो भयंकर त्रासदी मचाती है!
साल 2004 की घटना
ऐसी ही एक भयानक घटना साल 2004 में काटी थी, जब 26 दिसंबर साल 2004 को इंडियन ओशियन में मानव इतिहास की सबसे भयानक सुनामी उठी, समुद्र के अंदर 9.3 ट्रैक्टर स्केल का भूकंप आया, जिससे इंडियन ओशन में 100 फीट ऊंची लहरों का निर्माण हुआ, जिन्होंने आसपास के 14 देश में कोहराम मचा दिया, वह भूकंप इतिहास का सबसे ज्यादा देर तक रिकॉर्ड किया जाने वाला भूकंप था!
जो की 10 मिनट तक चलता रहा वह इतनी भयानक त्रासदी थी कि उसमें 230000 लोगों ने अपनी जान गवाई, लाखों लोग घायल हुए और बेघर हुए, सच में पृथ्वी के अंदर घट रही घटनाएं बहुत ही शक्तिशाली है, लेकिन अगर हम पृथ्वी के निर्माण के शुरुआत से लेकर अभी तक के सफर को देखें तो वास्तव में पृथ्वी पर ऐसी ऐसी चमत्कारी और विनाशकारी घटनाएं घटी थी जिनकी बदौलत आज पृथ्वी पर जीवन फल फूल रहा है !
जानें भारत की प्राचीन इतिहास – https://leverageedu.com/blog/hi/indian-history-in-hindi/
जानें डायनासोर का अंत और इंसानो की उत्पत्ति कैसे हुई,- https://dailyonline.news/%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b/
